शिक्षक दिवस के अवसर पर सभी का संविलियन और सहायक शिक्षकों की वेतन विसंगति दूर करे सरकार साथ ही अनुकम्पा नियुक्ति और क्रमोन्नति पर भी ले फैसला

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राजनांदगाव। छत्तीसगढ़ प्रदेश में शिक्षा की गुणवत्ता चिंतनीय तो नही है फिर भी शासकीय विद्यालयों में लोग अपने बच्चे को प्रवेश कराने में सोचते हैं,कि क्या जाने पढाई कैसी होगी ?वास्तव में यह हमारे प्रदेश की चिंता नही है,बल्कि सम्पूर्ण भारत वर्ष की समस्या है।छत्तीसगढ़ में गुणवत्ता अभियान भी चलाया गया,पर परिणाम अपेक्षा पूर्ण नही आया।वर्तमान समय मे छत्तीसगढ़ के शैक्षिक स्तर को ऊंचा उठाने के लिए कार्ययोजना निर्मित की जा रही है।

गढ़बो नवा छत्तीसगढ़ के नारों के साथ शिक्षा क्षेत्र भी अछूता नही है।प्रदेश निर्माण के पूर्व से ही शिक्षा के क्षेत्र में नवप्रयोग किये गए।शिक्षक के पद को मृत संवर्ग मानकर अल्पवेतन में पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग के अंतर्गत शिक्षाकर्मियों की नियुक्ति की गई।यह व्यवस्था शासन लगातार 18 वर्षों तक बरकरार रखने में शासन सफल भी रहा।इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि शिक्षक के रूप में नियुक्त युवाओं ने इस प्रकिया का जबरदस्त विरोध किया,क्योंकि इस तरीके से शासकीय विद्यालय अवश्य चल रहे थे लेकिन उनकी गुणवत्ता स्वमेव समाप्त हो गई।

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शिक्षाकर्मी के रूप में पदस्थ युवा वर्ग भी अपने भविष्य को लेकर सशंकित थे। प्रदेश के प्रथम सरकार के समय ऐसा लग था कि शायद सरकार बदलने से शिक्षाकर्मी अपनी बात सही तरीके से रख पाएंगे, किंतु ऐसा कुछ भी नही हुआ बल्कि शोषण का एक घिनौना चलता रहा।सरकार ने शिक्षाकर्मियों का नाम बदला,पर विभाग और दशा में कोई सुधार नही किया।परिणामस्वरूप आंदोलओ का वातावरण निर्मित हो गया।शिक्षक विद्यालय की अपेक्षा सड़को में आ गए।इस क्रम में मानसिक पीड़ा और हताशा में अनेक शिक्षकों की मृत्यु भी हो गई और दुर्भाग्यवश आज तक कइयों के परिजनों को अनुकंपा नियुक्ति भी नही मिल पाई है।

अक्सर ऐसे परिवारों की दुर्दशा के समाचार भी स्थानीय समाचार पत्रों ने प्रमुखता से प्रकाशित भी किये।शिक्षक को साक्षात ईश्वर मानने वाले समाज में शिक्षकों की ऐसी दुर्गति शायद ही किसी देश काल मे हुई होगी।स्वाभाविक रूप से इस पृष्ठभूमि में नौनिहालों की कई पीढ़ियों का नुकसान हुआ है, जिसका खामियाजा अंततः छत्तीसगढिया समाज को ही भुगताना पड़ रहा है। लिहाजा विगत जुलाई 2018 में शासन ने शिक्षाकर्मियों के शिक्षा विभाग में संविलिय का महत्वपूर्ण निर्णय लिया।पहले सरकार लगातार संविलियन को असंभव बताती रही,पर एकाएक संविलियन करके प्रदेश में शिक्षा के लिए अनुकूल वातावरण बनाने की शुरूआत कर दी।

आंदोलन में संविलियन होने की ऐतिहासिक प्रकिया में प्रदेश में शिक्षकों का सम्मान भी बढा है और शिक्षकों में कर्तब्यनिष्ठ की भावना भी बढ़ी।इधर शिक्षा विभाग के पुनर्निर्माण में शैक्षिक गुणवत्ता में अवश्य परिवर्तन परिलक्षित होगा।शिक्षकों ने भी उपेक्षा एवं शोषण का एक लंबा दंश झेला है अतएव उनमें भी गढ़बो नवा छत्तीसगढ़ की पुनीत भावना काम कर रहा है।पर्यावरण संरक्षण, नशामुक्ति, गिरते नैतिक मूल्यों को संरक्षित करना शिक्षकों की ही सर्वाधिक भूमिका है।

भारत के द्वितीय राष्ट्रपति डॉ.एस. राधाकृष्णन ने कहा था- इंसान ने आकाश में पक्षियों की तरह उड़ना,मछलियों की तरह तैरना,और चांद पर चलना सीख लिया।अब उसे इंसानों की तरह रहना सीखना होगा। वास्तव में वर्तमान समय मे मनुष्य को मानवीय संवेदनाओं के साथ जीने के लिए तैयार करने की आवश्यकता है।

हम केवल मशीनी आवेगों की तरह न रहे बल्कि मानवीय संवेदनाओं से भरकर जीवन यापन करें।समृद्धशाली भारत की यही पहचान बने।हमारी संस्कृति ही सर्वे भवन्तु सुखिनः की तरह है। इन्ही आशा और विश्वास के साथ छत्तीसगढ़ प्रदेश के मुखिया सम्मानीय श्री भूपेश बघेल जी से निवेदन है कि  05 सितंबर 2019 को शिक्षक दिवस के अवसर पर समस्त संविलियन से वंचित शिक्षको को संविलियन की सौगात दे।सहायक शिक्षको की वेतन विसंगति में सुधार किया जाय ।मृत शिक्षको के आश्रितों को अनुकम्पा दी जाय ।10 वर्ष से अधिक सेवा अवधि वाले शिक्षकों को क्रमोन्नति प्रदान की जाय । नियमानुसार पदोन्नति की प्रक्रिया प्रारम्भ की जाय । उक्त मांगो को सहानुभूति पूर्वक विचार करते हुए तत्काल घोषणा की जाय ।

आंदोलन से संविलियन होने तक अब भी है मांग अधूरा-देवेंद्र साहू(राजनांदगांव)

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